पालघर: जलवायु परिवर्तन का असर: पालघर सबसे अधिक समय तक रहा रेड अलर्ट पर, बाढ़ से जनजीवन प्रभावित — गणेश नाईक।

पालघर: जलवायु परिवर्तन का असर: पालघर सबसे अधिक समय तक रहा रेड अलर्ट पर, बाढ़ से जनजीवन प्रभावित — गणेश नाईक।

अखिलेश चौबे 
पालघर। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के कारण इस वर्ष पालघर और ठाणे जिले में हुई रिकॉर्ड वर्षा ने जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। पालघर जिला इस मानसून में महाराष्ट्र का सबसे अधिक समय तक 'रेड अलर्ट' पर रहने वाला जिला रहा, जिससे अनेक गांवों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई और बड़ी संख्या में नागरिकों को आर्थिक एवं सामाजिक नुकसान उठाना पड़ा। यह जानकारी पालघर के पालकमंत्री एवं वन मंत्री गणेश नाईक ने डहाणू स्थित उपविभागीय अधिकारी कार्यालय में आयोजित पत्रकार परिषद में दी।
पत्रकार वार्ता में सांसद डॉ. हेमंत सवरा, विधायक राजेंद्र गावित, जिला कलेक्टर डॉ. इंदू रानी जाखड़, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनोज रानडे, सहायक जिला कलेक्टर एवं डहाणू परियोजना अधिकारी विशाल खत्री सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
पालकमंत्री गणेश नाईक ने कहा कि कुछ दिन पहले कर्जमाफी और बिजली बिल राहत को लेकर समीक्षा बैठक आयोजित की गई थी, लेकिन उसके बाद हुई लगातार मूसलाधार वर्षा से जिले में पुनः व्यापक नुकसान हुआ। कई क्षेत्रों में अब भी घरों में पानी भरा हुआ है तथा नागरिकों और व्यापारियों को भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा है।
उन्होंने कहा कि अतिवृष्टि के कारण अनेक परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई है और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक वस्त्र व्यापारी को अकेले 40 से 50 लाख रुपये तक की आर्थिक हानि हुई है। ऐसे अनेक व्यापारी प्राकृतिक आपदा के कारण गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
पालकमंत्री ने कहा कि बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए व्यापारियों को अपने प्रतिष्ठान एवं संपत्ति का बीमा अवश्य कराना चाहिए। उन्होंने जनप्रतिनिधियों, व्यापारी संगठनों और सरकारी विभागों से मिलकर संपत्ति बीमा के प्रति व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में केवल राहत और बचाव कार्य पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पूर्व तैयारी, आपदा प्रबंधन, बीमा सुरक्षा और जनजागरूकता को भी समान महत्व देना आवश्यक है, ताकि भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

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