मुंबई: 59 वर्षीय महिला के पेट में 2.8 किलो की विशाल रसौली, सफल सर्जरी से बची जान।
मुंबई: 59 वर्षीय महिला के पेट में 2.8 किलो की विशाल रसौली, सफल सर्जरी से बची जान।
अखिलेश चौबे
मुंबई। 59 वर्षीय रजोनिवृत्त महिला के एक जटिल चिकित्सीय मामले ने यह स्पष्ट कर दिया कि सामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करना कितना खतरनाक हो सकता है। लगातार मितली की शिकायत लेकर उपचार के लिए पहुँची इस महिला को न तो पेट में दर्द था, न रक्तस्राव और न ही कोई स्पष्ट स्त्री-रोग संबंधी समस्या। प्रारंभ में चिकित्सकों ने इसे मूत्र संक्रमण मानकर उपचार शुरू किया, लेकिन आगे की जाँच में मामला अत्यंत गंभीर निकला—महिला को गुर्दे का तीव्र संक्रमण हो चुका था, जिसका कारण मूत्रवाहिनी पर बाहरी दबाव था।
विशेष बात यह रही कि सामान्य पेट परीक्षण के दौरान ही चिकित्सकों को पेट में असामान्य उभार महसूस हुआ, जिससे गंभीर स्थिति का संकेत मिला। अल्ट्रासोनोग्राफी जाँच में पता चला कि गर्भाशय में अत्यधिक बड़ी रसौली (फाइब्रॉइड) विकसित हो चुकी है, जिसका आकार लगभग 24 सप्ताह के गर्भ के बराबर था। मुख्य रसौली का व्यास लगभग 14 सेंटीमीटर था। यह बढ़ा हुआ गर्भाशय आसपास की आंतों तथा मूत्रवाहिनी को दबा रहा था, जिसके कारण मूत्र प्रवाह बाधित हुआ, संक्रमण बढ़ा और गुर्दे को दीर्घकालीन क्षति का खतरा उत्पन्न हो गया।
शल्यक्रिया के बाद निकाले गए गर्भाशय का वजन 2.8 किलोग्राम पाया गया, जो रजोनिवृत्ति के बाद की महिला में अत्यंत असामान्य माना जाता है। बाद में महिला ने बताया कि उनका पेट धीरे-धीरे बढ़ रहा था, पर उन्होंने इसे आयु के साथ बढ़ते सामान्य वजन के रूप में समझकर अनदेखा कर दिया। तीव्र दर्द या स्पष्ट लक्षण न होने के कारण उन्होंने समय पर परीक्षण नहीं कराया, जिससे रसौली बिना ध्यान दिए लगातार बढ़ती रही।
इस जटिल मामले का नेतृत्व डॉ. हेमाक्षी मेहता ने किया, जो बोरीवली स्थित एपेक्स सुपरस्पेशियलिटी चिकित्सालय में परामर्शदाता स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने बताया कि शल्यक्रिया का समय तय करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। सक्रिय गुर्दा संक्रमण के दौरान ऑपरेशन करने से संक्रमण बढ़ने तथा संज्ञाहरण संबंधी जटिलताओं का जोखिम रहता है, जबकि विलंब करने पर मूत्रवाहिनी पर दबाव बना रहता और गुर्दों को और अधिक क्षति पहुँच सकती थी।
चिकित्सक दल ने चरणबद्ध उपचार योजना अपनाई। सबसे पहले रोगी को भर्ती कर अंतःशिरा प्रतिजैविक दवाएँ दी गईं। गुर्दा रोग विशेषज्ञों की देखरेख में गुर्दों की कार्यक्षमता तथा संक्रमण स्तर की नियमित निगरानी की गई। संज्ञाहरण विशेषज्ञों ने शल्यक्रिया की तैयारी का आकलन किया। लगभग एक माह तक उपचार के बाद जब संक्रमण पूर्णतः नियंत्रित हो गया, तब दूरबीन (लेप्रोस्कोपिक) विधि से गर्भाशय तथा दोनों अंडाशयों को सुरक्षित रूप से निकाल दिया गया।
इतने अधिक वजन वाले गर्भाशय को दूरबीन विधि से निकालना अत्यंत जटिल प्रक्रिया मानी जाती है, जिसके लिए उच्च स्तर की शल्य-कौशल, सूक्ष्म योजना और विभिन्न विशेषज्ञों के बीच समन्वय आवश्यक होता है। शल्यक्रिया सफल रही और रोगी की गुर्दा कार्यक्षमता सुरक्षित बनी रही। ऑपरेशन के बाद महिला का स्वास्थ्य संतोषजनक पाया गया।
डॉ. हेमाक्षी मेहता ने कहा कि रजोनिवृत्ति के बाद पेट का असामान्य रूप से बढ़ना, मूत्र संबंधी बदलाव, बार-बार संक्रमण, लगातार मितली या अस्पष्ट अस्वस्थता जैसे लक्षणों को कभी भी सामान्य समझकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। समय पर किया गया साधारण परीक्षण भी गंभीर रोग का पता लगा सकता है और भविष्य में होने वाली बड़ी जटिलताओं से बचा सकता है। उन्होंने 50 वर्ष की आयु के बाद नियमित स्वास्थ्य परीक्षण को अत्यंत आवश्यक बताया।
यह मामला इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि शरीर में हो रहे धीमे लेकिन असामान्य परिवर्तनों पर ध्यान देना और समय पर चिकित्सकीय जाँच कराना जीवनरक्षक सिद्ध हो सकता है।
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