गुजरात: अखाड़ों की मिट्टी से उठकर बने गुजरात के चैंपियन: यदुवंश लालचंद पाठक की प्रेरक कहानी।
गुजरात: अखाड़ों की मिट्टी से उठकर बने गुजरात के चैंपियन: यदुवंश लालचंद पाठक की प्रेरक कहानी।
अखिलेश चौबे
गुजरात। भारतीय खेल परंपरा में कुश्ती का विशेष स्थान रहा है। देश के गाँवों के अखाड़ों से लेकर आधुनिक मैट कुश्ती तक, इस खेल ने अनेक ऐसे पहलवान दिए जिन्होंने अपनी मेहनत, अनुशासन और अदम्य साहस से पहचान बनाई। गुजरात की कुश्ती दुनिया में भी कई ऐसे नाम रहे हैं जिन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इन्हीं में एक प्रेरणादायी नाम था यदुवंश लालचंद पाठक, जिन्हें कुश्ती जगत में प्यार से “छोटेलाल पहलवान” के नाम से जाना जाता था।
05 अप्रैल 1960 को जन्मे और 03 मार्च 2026 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले यदुवंश लालचंद पाठक ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कुश्ती को समर्पित किया। लगभग दो दशकों से अधिक समय तक उन्होंने अखाड़ों और प्रतियोगिताओं में अपने दमदार दांव-पेच से पहचान बनाई। वे केवल एक खिलाड़ी ही नहीं बल्कि अनुशासन, संघर्ष और खेल भावना के प्रतीक थे।
यदुवंश लालचंद पाठक का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरापट्टी क्षेत्र में हुआ। बचपन से ही वे शारीरिक रूप से मजबूत और खेलों के प्रति उत्साही थे। ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े पाठक के जीवन में कुश्ती स्वाभाविक रूप से शामिल हो गई। उस समय गाँवों में अखाड़ों की परंपरा बेहद मजबूत थी, जहाँ युवा सुबह-सुबह मिट्टी के मैदान में अभ्यास करते थे।
पाठक ने भी अपने शुरुआती दिन इन्हीं अखाड़ों में बिताए। दंड-बैठक, कठिन अभ्यास, संतुलित आहार और गुरुजनों का मार्गदर्शन उनके जीवन का हिस्सा बन गया। धीरे-धीरे उन्होंने कुश्ती के दांव-पेच सीखे और स्थानीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया।
वर्ष 1983 में यदुवंश लालचंद पाठक ने गुजरात का रुख किया और अहमदाबाद को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उस समय गुजरात में मैट कुश्ती का प्रसार सीमित था और खेल के प्रति जागरूकता भी अपेक्षाकृत कम थी।
अहमदाबाद पहुँचने के बाद उन्होंने लगातार अभ्यास जारी रखा और स्थानीय प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया। अपनी ताकत, तकनीक और रणनीतिक समझ के कारण वे जल्द ही कुश्ती जगत में पहचान बनाने लगे। उनके मुकाबले देखने के लिए दर्शकों की भीड़ जुटने लगी और धीरे-धीरे वे गुजरात के प्रमुख पहलवानों में गिने जाने लगे।
अपने खेल जीवन के दौरान यदुवंश लालचंद पाठक का जुड़ाव भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) की खेल टीम से भी रहा। उस दौर में सरकारी संस्थानों की खेल टीमें खिलाड़ियों के लिए बड़ा मंच प्रदान करती थीं।
बीएसएनएल के माध्यम से उन्हें विभागीय और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने का अवसर मिला। उन्होंने इन प्रतियोगिताओं में अहमदाबाद और गुजरात का प्रतिनिधित्व करते हुए कई शानदार प्रदर्शन किए।
अपने कुश्ती करियर की शुरुआत पाठक ने 57 किलोग्राम फ्रीस्टाइल श्रेणी से की। बाद में उन्होंने 62 किलोग्राम और 68 किलोग्राम भार वर्ग में भी मुकाबले लड़े। लगभग 17 वर्षों से अधिक समय तक सक्रिय रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रतियोगिताओं में भाग लिया।
उनके दांव-पेच, फुर्ती और मुकाबले की रणनीति उन्हें अन्य पहलवानों से अलग बनाती थी। कुश्ती जगत में उनकी एक बड़ी उपलब्धि तब सामने आई जब उन्होंने प्रसिद्ध पहलवान नूरी को पराजित कर गुजरात कुश्ती चैंपियन का खिताब हासिल किया। इस जीत के बाद उनका नाम पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया।
1983 से 2002 के बीच यदुवंश लालचंद पाठक ने देश के कई राज्यों में आयोजित कुश्ती प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इन प्रतियोगिताओं में उन्होंने गुजरात का प्रतिनिधित्व किया और कई मजबूत प्रतिद्वंद्वियों का सामना किया।
1988 से 2002 का समय उनके खेल जीवन का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इस दौरान उन्होंने लगातार शानदार प्रदर्शन किया और कई मुकाबलों में जीत हासिल कर दर्शकों का दिल जीता।
यदुवंश लालचंद पाठक केवल एक मजबूत पहलवान ही नहीं बल्कि एक अनुशासित और सरल व्यक्तित्व के धनी थे। वे अक्सर युवाओं से कहते थे कि असली पहलवान वही होता है जो जीत में विनम्र और हार में धैर्यवान बना रहे।
उनका स्वभाव बेहद मिलनसार था और वे हमेशा साथी खिलाड़ियों की मदद के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने युवाओं को नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और नशामुक्त जीवन अपनाने की प्रेरणा दी।
अहमदाबाद की कुश्ती संस्कृति में एक ओर पारंपरिक मिट्टी के अखाड़े हैं, तो दूसरी ओर आधुनिक खेल परिसर और मैट कुश्ती का बढ़ता प्रभाव दिखाई देता है।
यदुवंश लालचंद पाठक उन पहलवानों में थे जिन्होंने इन दोनों परंपराओं के बीच संतुलन स्थापित किया। उन्होंने अखाड़े की मिट्टी में सीखे गए दांव-पेच को आधुनिक मैट कुश्ती की तकनीकों के साथ अपनाया और नई पीढ़ी को यह संदेश दिया कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की पूरक हो सकती हैं।
03 मार्च 2026 को यदुवंश लालचंद पाठक के निधन से गुजरात के कुश्ती जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन से एक समर्पित खिलाड़ी, अनुशासित व्यक्तित्व और प्रेरणादायी पहलवान को खो दिया गया।
अहमदाबाद और गुजरात के कुश्ती प्रेमी आज भी उन्हें सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं। उनके जीवन का संघर्ष और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
यदुवंश लालचंद पाठक की कहानी केवल एक पहलवान की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष, समर्पण और जुनून की कहानी है जो किसी भी खिलाड़ी को महान बनाती है।
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