पालघर: जिले में शिवसेना का दबदबा कायम, दहानू और पालघर में ऐतिहासिक जीत; भाजपा को करारा झटका।

पालघर: जिले में शिवसेना का दबदबा कायम, दहानू और पालघर में ऐतिहासिक जीत; भाजपा को करारा झटका।

अखिलेश चौबे
पालघर। जिले में संपन्न हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के परिणामों ने जिले की राजनीति की दिशा और दशा दोनों को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। जिले की दो सबसे महत्वपूर्ण नगर परिषदों पालघर और दहानू में शिवसेना ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए अपना दबदबा कायम रखा है। इन नतीजों ने न केवल शिवसेना की संगठनात्मक मजबूती को उजागर किया है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के कई राजनीतिक दावों को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।

महाराष्ट्र स्तर पर महायुति को बढ़त, लेकिन पालघर में तस्वीर अलग - महाराष्ट्र में नगर पंचायत और नगर परिषद चुनावों के सभी 288 में से 288 सीटों के नतीजे अथवा रुझान सामने आ चुके हैं। राज्य स्तर पर महायुति गठबंधन ने स्पष्ट बढ़त हासिल की है। पार्टीवार आंकड़ों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी ने 127 सीटें जीतकर महायुति की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है। वहीं शिवसेना को 54 सीटें और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 37 सीटें मिली हैं। इस प्रकार महायुति के खाते में कुल 218 सीटें गई हैं।
दूसरी ओर, महाविकास आघाड़ी का प्रदर्शन सीमित रहा। कांग्रेस ने 31 सीटें, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) ने 9 सीटें और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) ने 7 सीटें जीतीं। इस तरह महाविकास आघाड़ी को कुल 47 सीटों पर संतोष करना पड़ा। इसके अतिरिक्त अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 23 सीटें हासिल कीं।

◾पालघर और दहानू में शिवसेना की निर्णायक जीत
जिले की राजनीति में सबसे अधिक चर्चा पालघर और दहानू नगर परिषद को लेकर रही, जहां शिवसेना ने सीधे तौर पर भाजपा को करारा झटका दिया।
पालघर नगर परिषद चुनाव में शिवसेना (शिंदे गुट) के उत्तम घरत ने नगराध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। कुल 30 सीटों वाली इस परिषद में शिंदे गुट ने 19 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। वहीं भाजपा को 8 सीटें और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) को 3 सीटें मिलीं।
इसी तरह दहानू नगर परिषद में शिवसेना (शिंदे गुट) के राजेंद्र माच्छी नगराध्यक्ष निर्वाचित हुए। दहानू में कुल 27 सीटों वाली परिषद में भाजपा ने 17 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया, जबकि शिवसेना (शिंदे गुट) को 2 सीटें, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) को 2 सीटें और कांग्रेस को 6 सीटें प्राप्त हुईं। इसके बावजूद नगराध्यक्ष पद पर शिवसेना के प्रत्याशी की जीत ने राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे दिया।

◾जव्हार और वाडा में भाजपा को सफलता
जव्हार नगर परिषद में भाजपा की पूजा उदावंत नगराध्यक्ष निर्वाचित हुईं। वहीं वाडा नगर पंचायत में भाजपा की रीमा गंधे ने नगराध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की। वाडा की कुल 17 सीटों वाली नगर पंचायत में भाजपा ने 10 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। शिवसेना (शिंदे गुट) को 3 सीटें, जबकि शिवसेना (उद्धव गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और कांग्रेस को 1-1 सीट मिली।
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स्थानीय कार्यकर्ताओं की अनदेखी बनी भाजपा की कमजोरी
चुनावी विश्लेषण में यह तथ्य भी प्रमुखता से सामने आया कि भाजपा ने स्थानीय और पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर बाहरी तथा हाल ही में पार्टी में शामिल किए गए लोगों को नगरसेवक और नगराध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी। वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे जमीनी कार्यकर्ताओं को अवसर न मिलने से पार्टी के भीतर असंतोष पनपा, जिसका सीधा असर मतदान पर पड़ा। स्थानीय नागरिकों और कार्यकर्ताओं में यह भावना प्रबल रही कि भाजपा ने क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं और स्थानीय नेतृत्व को नजरअंदाज किया, जिससे पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

साधु हत्याकांड की छाया और भाजपा को नुकसान- इस चुनाव में एक अहम पहलू यह भी रहा कि पालघर साधु हत्याकांड की स्मृति जनता के मन से अब तक धुंधली नहीं हुई है। स्थानीय मतदाताओं के बीच यह धारणा स्पष्ट रूप से देखने को मिली कि भाजपा द्वारा काशीनाथ चौधरी को पार्टी में शामिल किया जाना जनता को स्वीकार नहीं हुआ। साधु हत्याकांड से जुड़े आरोपों के कारण मतदाताओं में नाराजगी देखी गई, जिसका सीधा असर भाजपा के मतदान प्रतिशत पर पड़ा।

लोकसभा को लेकर भाजपा के दावे कमजोर- इन नगर परिषद चुनावों के नतीजों ने भाजपा के उस दावे को भी कमजोर कर दिया है, जिसमें कहा जा रहा था कि लोकसभा चुनाव में सांसद की जीत पूरी तरह पार्टी की अपनी ताकत का परिणाम थी। पालघर जिले में सामने आए नतीजों से यह स्पष्ट हो गया है कि लोकसभा में मिली सफलता महायुति के संयुक्त समर्थन का परिणाम थी, न कि किसी एक पार्टी के अकेले बल पर मिली जीत। स्थानीय स्तर पर भाजपा की स्थिति कमजोर पड़ते ही उसका यह दावा भी धराशायी होता नजर आया।

शिवसेना के लिए मजबूत आधार, भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय- राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह चुनावी परिणाम भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय हैं, जबकि शिवसेना के लिए यह जीत आने वाले समय की राजनीति की मजबूत नींव साबित हो सकती है। पालघर और दहानू में मिली ऐतिहासिक विजय ने यह संदेश साफ कर दिया है कि जनता अब केवल नारों पर नहीं, बल्कि जमीन पर किए गए काम, स्थानीय नेतृत्व और भरोसे की राजनीति के आधार पर अपना फैसला सुना रही है।

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